मुख्य बातें
- छत्तीसगढ़ के धमधा में किसान वैश्विक तनाव और मौसम की मार से परेशान हैं।
- ईंधन और बिजली की बढ़ती लागत ने फसल की सिंचाई को मुश्किल बना दिया है।
- बाजार में खरीदारों की कमी के कारण किसान अपनी फसलें उखाड़ने को मजबूर हैं।
- किसानों की मांग न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की है ताकि जोखिम का आकलन कर सकें।
छत्तीसगढ़ के धमधा क्षेत्र में किसान इस समय गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। वैश्विक तनाव और मौसम की प्रतिकूलता के कारण ईंधन और बिजली की लागत में वृद्धि हुई है। इसके चलते, फसलें तैयार होने के बावजूद बाजार में खरीदारों की कमी और परिवहन में बाधाओं के कारण किसान अपनी फसलें उखाड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
ईंधन संकट और बिजली की मार
किसान शेर सिंह ने बताया कि इस वर्ष महंगाई ने उनकी स्थिति को बेहद कठिन बना दिया है। ईंधन की उपलब्धता और कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण सिंचाई पंप चलाना मुश्किल हो गया है। तेज आंधी-तूफान ने बिजली के खंभे और तारों को तोड़ दिया, जिससे कई दिनों तक बिजली आपूर्ति बाधित रही। इस स्थिति में, फसल को बचाने के लिए महंगे डीजल से जनरेटर चलाने पड़े, जिससे उन्हें 10 दिनों में लगभग 1.2 लाख रुपये खर्च करने पड़े।
फसल तैयार, पर खरीदार गायब
किसानों की असली समस्या तब शुरू हुई जब फसल कटाई के लिए पूरी तरह तैयार हो गई। किसान जालम पटेल ने बताया कि इस बार फसलों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने वाली गाड़ियां नहीं मिलीं। पश्चिम बंगाल, दिल्ली और हरियाणा से व्यापारी इस बार बहुत कम आए, जिससे पपीते समय पर मंडियों तक नहीं पहुंच सके। मजबूरी में किसानों को अपनी खड़ी फसलें खेत से हटानी पड़ीं।
लागत बढ़ी, जोखिम बढ़ा और राहत नहीं
युवा किसान मधुसूदन राणा ने बताया कि बागवानी में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की कीमतें पिछले एक साल में 40 से 50 फीसदी तक बढ़ गई हैं। पहले एक एकड़ खेत को तैयार करने में 15 हजार रुपये लगते थे, जो अब 25 से 30 हजार रुपये तक पहुंच गया है। अनियमित बिजली आपूर्ति ने किसानों की निर्भरता डीजल जनरेटरों पर बढ़ा दी है, जिससे लागत में भारी इजाफा हुआ है।
सरकारी योजनाएं और जमीनी हकीकत
सरकार की ओर से सस्ती बिजली और कृषि योजनाओं के दावे किए जाते हैं, लेकिन किसानों का कहना है कि ये योजनाएं उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही हैं। कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने कहा कि सरकार विभिन्न योजनाओं के जरिए किसानों की मदद कर रही है। हालांकि, किसानों की सबसे बड़ी मांग बागवानी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करने की है, ताकि वे खेती शुरू करने से पहले अपने जोखिम का आकलन कर सकें। धमधा के कई किसान बढ़ती लागत और अनिश्चित मुनाफे के बीच फंसे हुए हैं, जहां तैयार फसल होने के बावजूद राहत की कोई उम्मीद नहीं है।












