मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने मादक पदार्थों की तस्करी के मामलों में सख्त कार्रवाई की आवश्यकता बताई।
- जमानत याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने युवाओं के जीवन को बचाने की बात की।
- आरोपी ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी, जो पहले ही जमानत खारिज कर चुका था।
- एनडीपीएस अधिनियम, 1985 के तहत मादक पदार्थों की तस्करी पर सख्त सजा का प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट ने मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े मामलों में कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया है। यह टिप्पणी उस समय आई जब कोर्ट ने एनडीपीएस अधिनियम, 1985 के तहत जून 2022 में गिरफ्तार एक आरोपी की जमानत याचिका को खारिज किया। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस शील नागू और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि ड्रग्स का कारोबार करने वालों से सख्ती से निपटने की जरूरत है, क्योंकि वे देश के युवाओं का जीवन बर्बाद कर रहे हैं।
जमानत याचिका का विवरण
आरोपी ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि यह आरोपी की लगातार छठी जमानत अर्जी थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 11 जून 2022 को आरोपी और उसके दो साथी एक बैग के साथ खड़े थे, जिन्हें देखकर वे भागने लगे। तलाशी के दौरान बैग से करीब 10.15 ग्राम 21 एमडीएमए (एक्स्टेसी) गोलियां बरामद हुई थीं।
बचाव पक्ष की दलीलें
हाईकोर्ट में बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि बरामद नशीला पदार्थ 5 जुलाई 2022 को विशेष अदालत में पेश किया गया और उससे पहले यह बिना उचित अनुमति के पुलिस के कब्जे में रहा। इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि नवंबर 2024 में मुकदमा पूरा करने का निर्देश दिए जाने के बावजूद सुनवाई लंबित है और सह-आरोपियों को जमानत मिल चुकी है।
राज्य सरकार का पक्ष
हालांकि, राज्य सरकार ने कहा कि बरामद एमडीएमए व्यावसायिक मात्रा में था और इस अपराध में तीन लोग शामिल थे। हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी जमानत देने से इनकार कर दिया।
एनडीपीएस अधिनियम, 1985 का महत्व
एनडीपीएस अधिनियम, 1985 भारत का एक सख्त कानून है, जिसका उद्देश्य नशीले पदार्थों की तस्करी, उत्पादन, बिक्री और उपयोग पर रोक लगाना है। यह कानून गांजा, हेरोइन, अफीम, कोकीन, एमडीएमए जैसे ड्रग्स से जुड़े अपराधों पर लागू होता है। इसमें अपराध की गंभीरता के अनुसार सजा और जुर्माने का प्रावधान है, जिसमें कई मामलों में 10 से 20 साल तक की सजा और भारी जुर्माना शामिल है। “कमर्शियल क्वांटिटी” वाले मामलों में जमानत मिलना कठिन होता है, जिसका उद्देश्य समाज को नशे के खतरे से बचाना है।












