मुख्य बातें
- जोधपुर में स्वदेशी आत्मघाती ड्रोन ‘दिव्यास्त्र एमके-1’ का सफल परीक्षण हुआ।
- यह ड्रोन 500 किलोमीटर की रेंज और 5 घंटे तक उड़ान भरने में सक्षम है।
- 53 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी ड्रोन ने अपनी क्षमता साबित की।
- मोबाइल लॉन्चर सिस्टम इसे युद्धक्षेत्र में तेजी से तैनात करने की अनुमति देता है।
जोधपुर में भारतीय सेना की सामरिक क्षमताओं को बढ़ाने के लिए स्वदेशी आत्मघाती ड्रोन ‘दिव्यास्त्र एमके-1’ का सफल प्रदर्शन किया गया। इस ड्रोन ने कठिन परिस्थितियों में अपनी क्षमता साबित करते हुए सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया। यह ड्रोन दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और सटीक हमले करने में सक्षम है।
प्रदर्शन की विशेषताएँ
दुनिया की रक्षा क्षेत्र की कम्पनी होवरिट द्वारा विकसित ‘दिव्यास्त्र एमके-1’ का परीक्षण जोधपुर में एसयूवी पर लगाए गए मोबाइल लॉन्चर से किया गया। परीक्षण के दौरान कई सफल लॉन्चिंग की गई, जिसमें ड्रोन ने सभी निर्धारित मानकों को पूरा किया। इसकी अधिकतम परिचालन रेंज 500 किलोमीटर है, और यह लगातार पांच घंटे तक हवा में रह सकता है।
कठिन परिस्थितियों में परीक्षण
इस ड्रोन में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर, कम्युनिकेशन रिले सिस्टम और विभिन्न प्रकार के वारहेड लगाए जा सकते हैं। परीक्षण के दौरान इसकी इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (आईएसआर) क्षमताओं का भी मूल्यांकन किया गया। खास बात यह है कि ‘दिव्यास्त्र एमके-1’ को 53 डिग्री सेल्सियस तापमान और 50 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार से चल रही हवाओं में संचालित किया गया, जहां इसने सफल प्रदर्शन किया।
आत्मघाती ड्रोन की विशेषताएँ
सामान्य ड्रोन का उपयोग मुख्य रूप से निगरानी और सूचनाएं जुटाने के लिए किया जाता है, जबकि आत्मघाती ड्रोन या लोइटरिंग म्यूनिशन का उद्देश्य लक्ष्य को नष्ट करना होता है। ये ड्रोन लंबे समय तक हवा में मंडरा सकते हैं और लक्ष्य की पहचान होने पर सीधे उस पर हमला कर खुद भी नष्ट हो जाते हैं।
मोबाइल लॉन्चर सिस्टम का महत्व
‘दिव्यास्त्र एमके-1’ की सबसे बड़ी विशेषता इसका मोबाइल लॉन्चर सिस्टम है, जिसे किसी वाहन पर लगाकर जरूरत के अनुसार किसी भी स्थान पर पहुंचाया जा सकता है। युद्धक्षेत्र में तेजी से बदलती परिस्थितियों के बीच यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों, रेगिस्तान और घने जंगलों जैसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में यह प्रणाली भारतीय सेना के लिए अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती है।












