मुख्य बातें
- सीपीजे ने बांग्लादेश में प्रेस की स्वतंत्रता बहाल करने के लिए 10 कदम सुझाए हैं।
- पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के समर्थकों के खिलाफ दर्जनों पत्रकारों को हिरासत में लिया गया है।
- बांग्लादेश के उच्च न्यायालय ने कुछ पत्रकारों को जमानत दी, लेकिन वे अभी भी हिरासत में हैं।
- सीपीजे ने पत्रकारों के खिलाफ दायर मामलों की समीक्षा की मांग की है।
पत्रकारों की सुरक्षा समिति (सीपीजे) ने बांग्लादेश में प्रेस की स्वतंत्रता को बहाल करने के लिए 10 महत्वपूर्ण कदमों की सिफारिश की है। इसने सरकार से आग्रह किया है कि वह पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों का दुरुपयोग बंद करे और मीडिया पर हमलों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करे। यह स्थिति तब उत्पन्न हुई जब अगस्त 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद से कई पत्रकारों को हिरासत में लिया गया है।
पत्रकारों की हिरासत की स्थिति
सीपीजे ने बताया कि बांग्लादेश में कई पत्रकार, जैसे एकत्तर टीवी की फरज़ाना रूपा, शकील अहमद और मोज़म्मेल बाबू, भोरर कागोज के श्याममल दत्ता, अगस्त और सितंबर 2024 से हिरासत में हैं। हालांकि, बांग्लादेश के उच्च न्यायालय ने 11 मई को रूपा और अहमद को जमानत दी थी, लेकिन वे अन्य मामलों में अभी भी जेल में हैं।
सरकार की जिम्मेदारी
सीपीजे ने बांग्लादेश सरकार से अनुरोध किया है कि वह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुसार पत्रकारों के खिलाफ दायर सभी मामलों की समीक्षा करे। इसके अलावा, पत्रकारिता से जुड़े मामलों में अभियोजकों को जमानत का विरोध करने से रोकने और “केस-स्टैकिंग” की प्रथा को समाप्त करने की आवश्यकता है।
अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण की चिंता
सीपीजे ने बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आईसीटी) द्वारा पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई पर भी चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में कम से कम 25 पत्रकार आईसीटी की जांच के दायरे में हैं, जिनमें हसीना सरकार के दौरान की गई कवरेज से जुड़े मामले शामिल हैं।
मीडिया पर हमले और जवाबदेही
सीपीजे ने बांग्लादेश में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न की घटनाओं का भी उल्लेख किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर 2025 में हुई अशांति के दौरान कई मीडिया संस्थानों पर हमले हुए, जिससे प्रमुख समाचार पत्रों को अस्थायी रूप से प्रकाशन बंद करना पड़ा।
सीपीजे ने इस बात पर जोर दिया है कि न्याय राजनीतिक विचारों पर निर्भर नहीं होना चाहिए और सरकार को पत्रकारों और मीडिया संगठनों को भीड़ हिंसा से बचाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।












