भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों का नया युग
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मित्रता अब एक नए स्तर पर पहुंच चुकी है। कैनबरा की संसद में जब ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने भाषण दिया, तो वह केवल दो देशों की बात नहीं कर रहे थे, बल्कि एक नई वैश्विक व्यवस्था का संकेत दे रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत इस दशक में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाएगा। यह बयान केवल कूटनीतिक शब्दावली नहीं है, बल्कि उस ड्रैगन (चीन) की हार की कहानी भी है जिसने कभी प्रशांत महासागर को अपनी जागीर समझा था। यह भारत की उस मजबूत आवाज का प्रतीक है जो अब विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। कैनबरा में उनके भाषण को भारत के लिए एक प्रशस्ति पत्र माना गया, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत अब दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश है। यह जनसंख्या कोई बोझ नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाला इंजन है। अल्बनीज ने स्पष्ट कर दिया कि भारत और ऑस्ट्रेलिया की मित्रता अब सिर्फ क्रिकेट और खानपान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुरक्षा और समृद्धि का मजबूत संगम बन चुकी है। जब कोई देश दूसरे देश की प्रगति को अपने लिए अवसर मानता है, तो यह रणनीतिक भरोसे का प्रमाण है। ऑस्ट्रेलिया अब मान चुका है कि हिंद प्रशांत क्षेत्र में बिना भारत के कोई भी कदम नहीं उठ सकता है।
व्यक्तिगत संबंध और रणनीतिक साझेदारी
इस कहानी का सबसे भावुक और प्रेरणादायक पहलू है एंथनी एल्बनीज का भारत से व्यक्तिगत रिश्ता। 1991 में जब भारत आर्थिक संकट से जूझ रहा था, उस समय एक युवा विदेशी युवक भारत की गलियों में घूम रहा था, कंधे पर बैग टांगे। आज वही युवक ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने उस समय ट्रेन के डिब्बे में बैठकर उस भारत को देखा था, जिसे दुनिया गरीबों का देश कहती थी। अब जब वे मोदी का स्वागत करने जा रहे हैं, तो वह एक डिजिटल शक्ति और ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब को देख रहे हैं। यही कारण है कि अल्बनीज और मोदी के बीच की केमिस्ट्री किसी भी अन्य वैश्विक नेता से अधिक और सच्ची प्रतीत होती है। बता दें कि बीजिंग की दीवारों के पीछे आज खामोशी छाई है, क्योंकि भारत और ऑस्ट्रेलिया ने मिलकर चीन के विस्तारवाद के खिलाफ अंतिम कदम उठाने की योजना बना ली है। हाल ही में दिल्ली में हुई क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक ने एक ऐसा ब्लूप्रिंट तैयार किया है, जिसने ड्रैगन को नींद से जगा दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो, भारत के एस जयशंकर और ऑस्ट्रेलिया की पेनी वोंग ने मिलकर समुद्री निगरानी और ईंधन सुरक्षा के क्षेत्र में एक मजबूत जाल बुन लिया है, जिसमें अब चीन का कोई स्थान नहीं है। अब समुद्र में किसी भी एक देश की दादागिरी नहीं चलेगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून का राज होगा।
आर्थिक और रणनीतिक सहयोग का विस्तार
दोस्तियों के साथ-साथ व्यापार भी रिश्तों की मजबूत नींव है। भारत को 2030 तक अपनी सड़कों पर करोड़ों इलेक्ट्रिक वाहनों को उतारने का लक्ष्य है, जिसके लिए उसे लिथियम की आवश्यकता है। जवाब है ऑस्ट्रेलिया, जिसके पास विश्व का सबसे बड़ा लिथियम भंडार है। 2022 का आर्थिक समझौता यानी ईसीटीए अब उस ऊंचाई पर पहुंच चुका है, जहां ऑस्ट्रेलिया का कच्चा माल और भारत की तकनीक मिलकर नई वैश्विक सप्लाई चेन का निर्माण कर रहे हैं। यह चीन की आर्थिक प्रभुत्व पर भारत और ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा हमला है। ऑस्ट्रेलिया की आत्मा अब भारतीय रंग में रंग चुकी है। वहां करीब दस लाख भारतीय मूल के लोग हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सिडनी के हैरिस पार्क का नाम बदलकर लिटिल इंडिया करना केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं है, बल्कि यह उस शक्ति का संकेत है जो भारत को ऑस्ट्रेलिया की राजनीति में निर्णायक स्थान देती है। अल्बनीज ने संसद में वादा किया है कि वे भारत विरोधी या विभाजनकारी तत्व जैसे कि खस्तानी अलगाववाद को ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पनपने नहीं देंगे। यह मोदी की सॉफ्ट पावर की बड़ी जीत है।












